Saturday, April 16, 2011

ज़िंदगी की तलाश में ये कहां आ गए हम?

सामंजस्य बिठाना भी एक कला है. ज़िंदगी में कई ऎसे मोड़ आते हैं, जब इंसान सामंजस्य और समझौते में फर्क करना भूल जाता है. भागमभाग की इस जीवनशैली में हम सेल्फकंसंट्रेटेड होते चले जाते हैं. खुद को लेकर पनपता असुरक्षा का भाव हमें इतना कन्फाइंड कर देता है कि हमारे चाहने वाले धीरे-धीरे हमसे दूर होने लगते हैं. हम अपने चारों ओर एक काल्पनिक दुनिया बना लेते हैं और ताउम्र ज़िंदगी जी लेने का बस नाटक करते रहते हैं.

प्रोफेशनलिज्म हमारी संवेदनाओं पर एक मोटी परत चढा देती है और धीरे-धीरे हम अपनी आवश्यक औपचारिकताओं को नज़रअंदाज करने लगते हैं. धीरे-धीरे हमसब स्वभाव से भी अवसरवादी हो जाते हैं. हमें सहकर्मियों से बात करने की फुरसत मिल जाती है. लाख व्यस्तताओं के बावजूद भी हम अपने बॉस को ग्रीट करना नहीं भूलते हैं.

हां, हम भूल जाते हैं या फिर हमें वक्त नहीं मिलता है अपने मां-बाबूजी और अन्य परिवारवालों के लिए. इस सबके लिये हमारे पास ठोस वजह भी होती है. हम पर प्रेशर होता है करियर, समाज और सरोकार का. सिर्फ अपना परिवार ही तो परिवार नहीं होता न. हमें याद नहीं रहता है कि हमने आखरी बार कब मां से बात की थी. अगर कभी स्नेह से वो शिकायत करती भी हैं तो हमारे पास माकूल सा जवाब होता है कि बाबूजी से तो बात कर ही लेता हूं. हमें नहीं याद है कि डॉक्टर ने उन्हें कौन सी दवाई अब उम्र भर लेने को कहा है. लेकिन उन्हें आज भी याद है कि बचपन में मुझे किस डॉक्टर का ट्रीटमेंट मुझे ज्यादा सूट किया करता था. राखी के मौके पर हॉस्टल से मेरे आने तक बहन भूखी रहती थी, भले शाम क्यूं न हो जाए. बिना राखी बांधे वो एक निवाला भी नहीं खाती थी. आज मेरी इस अतिमहत्वाकांक्षी दुनिया को वो भी समझ गई है. राखी कूरियर कर देती है, पूछ लेती है मिल गया…बांध लिए….और वो खुश हो लेती है. हमें याद है बाबू जी ने कई बार अपनी ख्वाहिशों को हमारी खुशी के लिये दफनाया था. आज जब हमारी बारी है तो हम सामंजस्य बिठाने के बजाय इससे पल्ला झाड़ते नज़र आते हैं.

जीवनसाथी चुनने को लेकर भी यही ऊहापोह बनी रहती है. हमारी कोशिश होती है कि हमें ऎसा पार्टनर जो हमारे कॅरियर ओरिएंटेड माइंड पर टीका टिप्पणी न करे. वो हमारे कॅरियर के ग्रोथ मे मददगार हो. सेंटीमेंट, स्नेह सब सेकेंडरी हो जाती है.

वस्तुतः सबकुछ पा लेने, खुद को सेक्योर कर लेने की अंधी चाहत हमे ऎसे मोड़ पर ला खड़ा करती है, जहां सबकुछ होते हुए भी हमारे पास बहुत कुछ नहीं होता है.जब तक हमें इसका एहसास होता है परिस्थितियां बदल चुकी होती है. हमारे चाहने वाले एक माइंडसेट तैयार कर लेते हैं कि हमारा लाइफ स्टाइल ही यही है. और जब हमें जरूरत होती है स्नेह, प्रेम, वात्सल्य की तो हमारे चारों ओर सिवाय निर्वात के कुछ नहीं मिलता. ज़िंदगी जीने के लिये हमें सामंजस्य बिठाने की कला सीखनी होगी. हमे फर्क करना सीखना होगा समझौते और सामंजस्य में।

Wednesday, April 6, 2011

बिहार दिवस अथ इमेज बिल्डिंग की क़वायद


बिहार दिवस के दौरान ऐसा ताना-बाना बुना गया मानो बिहार का कायाकल्प हो गया। अकेले पटना में करोड़ों रूपये खर्च कर भव्य आयोजन किया गया। हर जिले को तकरीबन तीन लाख की राशि बिहार से आयोजन पर खर्च करने को दिये गए।

राज्य प्रायोजित इस आयोजन से आम आदमी का हित सधता कहीं नहीं दिखा। यह महज़ एक प्रशासनिक कार्यक्रम भर रहा। पूरे तीन दिनों के इस भव्य आयोजन में सरकार अपनी पीठ खुद थपथपाती रही। बिहार दिवस यानि बिहार विज्ञापन के इस मौके़ पर देश के कई हिस्सों से कलाकारों के साथ-साथ राजनेताओं को भी आमंत्रित किया गया। लेकिन सत्ता के मद में चूर नीतीश प्रोटोकॉल भी भूल गए। विपक्ष का एक अदना विधायक भी इस कार्यक्रम में कहीं शरीक नहीं हुआ।
कोई शक नहीं कि विकास नहीं हुआ है। लालू-राबड़ी राज की अपेक्षा बदलाव जरूर नज़र आते हैं। चिकनी-चुपड़ी सड़कें और साइकिल से बच्चियों का स्कूल जाना बड़ी ही आसानी से दिख जाता है। अपनी जीडीपी ग्रोथ रेट को लेकर सुशासन बाबू तो वाहवाही पहले ही बटोर चुके हैं लेकिन सच्चाई कुछ और भी है। जीडीपी के बढ़ने के बाद भी बिहार के मानव विकास सूचकांक में कोई खास अंतर नहीं आया है। आज भी बिहार की 70 प्रतिशत आबादी 20 रूपये रोजाना पर जीने को विवश है।

तीन दिवसीय इस आयोजन में करोड़ों खर्च किये गये लेकिन सरकार ने एक बार भी उन विभागों के बारे में नहीं सोचा जिन्हें पिछले 5-6 महीनों से वेतन नहीं दिया गया। यह बिहार दिवस का आयोजन सरकारी अस्पताल और स्कूलों के कर्मचारियों के जले पर नमक लगाने जैसा था। इन कर्मियों को पिछले 6-7 महीनों से वेतन नसीब नहीं हुआ है।
बिहार विकास की पटरी पर सरपट दौड़ रही है। ऐसा सरकार कहती है और इसे और बेहतर तरीके से परोसती है बिहारी मीडिया। बिहार की पूरी मीडिया इस पत्रकारिता में लगी हुई है। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बिहार के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है। लेकिन पिछले साल एक गै़रसरकारी संस्था ‘असर’ ने रिपोर्ट जारी किया कि बिहार के स्कूलों में ऐसे बच्चों की संख्या काफी बढ़ी है, जो पढ़ते तो हैं पांचवी में परन्तु उन्हें दूसरी कक्षा की भी पूरी जानकारी नहीं है।

बिहार को विकसित बनाने का सपना और उसके लिए प्रयासरत हमारे मुख्यमंत्री आये दिन केन्द्र पर आरोप लगाते रहते हैं। पिछले कुछ दिनों से सूबे में बिजली की संकट भी चली आ रही है। बिहार दिवस के दौरान पूरे सूबे से बिजली की कटौती कर पटना के गांधी मैदान को जगमगाया जा रहा था। इन तीन दिनों के दौरान भागलपुर, कटिहार, नवादा और शेखपुरा में लोगों ने बिजली को लेकर जमकर हंगामा किया और आगजनी की घटना को अंजाम दिया। कई जिले तो 24-24 घंटों तक बिजली से महरूम रहा।
इधर बिहार दिवस के समापन पर नवादा जिले में वहां के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने बार-बालाओं के नृत्य भी सरकारी खर्चे पर करवाये। यह मामला विधान सभा तक भी पहुंचा और हंगामा हुआ।

बिहार दिवस के आयोजन को नीतीश सरकार ने राजग गठबंधन के प्रचार का मंच बना दिया। विकास हुआ है इसमें दो मत नहीं, लेकिन इसका प्रचार इतना अधिक किया गया कि जिससे जनता को भी यह भ्रम हो जाए कि बिहार सही में एक विकसीत राज्य बन रहा है। लेकिन शायद सरकार यह भूल गई कि भूखी जनता को समारोह नहीं बल्कि रोटी चाहिए।

Thursday, March 31, 2011

डुमरी मोरा गाँव


रात के करीब आठ बज रहे होंगे. हमारी ट्रेन बेगुसराय स्टेशन पर रुकी. भारतीय परंपरा को निभाते हुये ट्रेन अपने नियत समय से मात्र दो घंटे लेट थी। मैं झट से स्टेशन से बाहर निकला अैर एक रिक्शे पर जाकर पसर गया.
भैया डुमरी जाना है.
25 रूपये लगेंगे,
मेल-जोल के मूड में मै भी नहीं था, हामी भर दी.
मुख्य शहर से हम गांव की ओर बढने लगे थे। धीरे-धीरे बिजली की चकाचऔंध गायब हो रही थी. अब हम गांव को जाने वाली मुख्य सड़क पर आ गये थे। बिल्कुल ही धुप्प अंधेरे में वो हमसे बातें करता हुआ बड़ी ही तेजी से रिक्शा खींचे जा रहा था, मैंने अपने बैग को कस कर पकड़ लिया था. क्योंकि अबतक के अनुभव से मुझे यही ज्ञात था कि हमारे गांव की सड़क पर गड्ढे नहीं बल्कि गांव की सड़क ही गड्ढे में है. थोड़ी दूर चलने के बाद मैं आश्वस्त हो गया कि सड़क चिकनी-चुपड़ी है.
मैने मन ही मन सुशासन बाबु को धन्यवाद दिया कि वाह साहब वाकई आपने विकास किया है.
थोड़े समय बाद ही मैं घर पहुंच गया था. मैं बोल पड़ा, वाह रे गांव का अनुमानित समय से पहले ही घर पहुंचा दिया, वो भी बिना हिचकोले.
सबसे मिलने-जुलने और खाना खाने के बाद मैं भी सोने चला गया.
सुबह हो चली थी. मैं बबूल का दतवन मुंह में दबाये मुहल्ले की सड़क पर टहल-टहल कर गांव को निहार रहा था. कितना बदल गया है मेरा गांव हर घर के छत पर पानी की टंकी, दलान पर नल की टोंटी. हर दूसरे व्यक्ति के हाथ में मोबाइल. यह सब देखकर बड़ा ही अच्छा लग रहा था.
बच्चों के स्कूल जाने का समय हो चला था. DAV, DPS और भी कई स्कूलों की गाडि़यां अब मेरे गांव तक भी आने लगी थी. मेरे पड़ोस की दादी चाची भाभी अपने अपने घर से बच्चों को लेकर सड़क के किनारे खड़ी थीं.
अचानक मेरी नज़र ठिठकी, मैंने देखा कि कुछ बच्चे अपने कांख के नीचे बोरिया और पन्नी में अपना बस्ता दबाये सरकारी स्कुल को जा रहे हैं. मेरे मुहल्ले के उस सरकारी स्कुल में दलितों के बच्चे पढते हैं या उन सवर्णो के बच्चे पढते हैं जो आर्थिक रूप से दलित हैं.
वह स्कूल मेरे घर से थोड़ी ही दूरी पर है सो मेरा जाना वहां भी हुआ.
पीपल का विशाल पेड़, कुंआ, पंचायत भवन, मंदिर और इन सब के पास ही वो सरकारी स्कुल मुझे अपने बचपन के दिन याद आ रहे थे. इन सब के बावजूद भी बहुत कुछ बदल चुका था. कुआं लगभग सूख गया था, पीपल के उस पेड़ के नीचे लोग आज भी ताश खेल रहे हैं. बस थोड़ा सा अंतर है, आज बूढे अैर नौजवान एक साथ चौकड़ी जमाये हुये हैं. मैं बुदबुदाया कि वाह इसे कहते हैं रेडिकल होना.
चूंकी शहर मेरे गांव के करीब आ गया है सो वहां की जमीन मंहगी हो गयी है. इन नौजवानो का प्रमुख शगल है जमीन बेच कर अय्याशी करना. नयी-नयी बाइक, नये-नये मोबाइल इनके रूतबे को बढाता है. और जो थोड़े सही हैं सूद पर पैसे लगाते हैं.
कुछ दिन गांव मे रहने पर कुछ और ही पता चला. जो मेरे हमउम्र हैं वो इसी स्कुल के पास मंडराते या बैठे रहते हैं. उनका काम होता है वहां बैठ कर स्कुल की जवान हो रही लड़कियों पर डोरे डालना, वहीं बैठ कर दारू-बीयर पीना. अब तो मेरे गांव मे भी चिल्ड बीयर मिलने लगी है. नितीश बाबु ने सिर्फ सड़कें ही नहीं, ठेके को भी गांव-गांव तक पहुंचाया है.
पता करने पर मालूम हुआ कि कुछ लड़कियां तो इनके बहकावे आ गयी हैं लेकिन कुछ ने इसका विरोध करते हुये इसकी जानकारी अपने बाप-भाई को दे दी. ये गरीब और दबे-कुचले बाप इन सवर्ण के लौंडे को कुछ कहने से रहे उल्टे कच्ची उम्र में ही बेटी को ब्याह देते हैं.
मैंने मुहल्ले के कुछ लोगों से इसकी शिकायत भी की लकिन कुछ हल निकलता दिखा नहीं. कुछ दिनों बाद मैं भी अपनी रोजी-रोटी के लिये वापस नौकरी पे आ गया.
आज गांव से एक लड़का आया है और अचानक घटनायें ताजा हो गई. बातों ही बातों में उसने बताया कि स्कुल में पढ रही एक लड़की मुहल्ले के एक लड़के के बहकाबे में आ गयी है. यह वाकया पूरे गांव में चर्चा का विषय है. दोनों जाती से सवर्ण हैं और मेरे ही मुहल्ले के हैं. बात यहीं खत्म नहीं होती है ये दोनो रिश्ते में चाचा-भतीजी हैं.
आज खुद पर पड़ी है तो मेरे मुहल्ले वासी को नैतिकता और मर्यादा याद आ रही है.
अगर शहरीकरण होने से इतना कुछ बदलता है तो बेहतर है गांव गांव ही रहे.

Tuesday, January 18, 2011

दूध के धुले हम भी नहीं, तुम भी नहीं


बेगूसराई की एक कवि गोष्ठी में सुना था, “मैं कली कचनार होता, तो बिका बाजार होता. मैं अगर मक्कार होता, तो देश की सरकार होता”. किन साहब की है पता नहीं. नेताओं के बारे में ऐसी राय रखने वाले ज्यादा से ज्यादा लोग आपको मिल जायेंगे. वजह हमें भी पता है और अपको भी, दोषी हम भी हैं और हमारे रहनुमा भी. नीतीश ने दूसरी पारी की शुरुआत की. भ्रष्टाचार उन्मूलन को प्रतिबद्ध श्री कुमार ने विधायक निधी को समाप्त कर दिया, यह भे घोषणा कर डाली की जिन अधिकारियों के पास आय से अधिक सम्पत्ती होगी उनके बंगलों में स्कूल खोले जायेंगे. इस दिशा में उनका यह पहला कदम था. वाहवाही होने लगी, उनकी तारीफ में कसीदे भी गढ़े जाने लगे. देखना है नीतेीश कब तक अपनी इस प्रतिबद्धता पर कायम रह पाते हैं. इंतजार रहेगा भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में उनके अगले कदम का. भ्रष्टाचार का तो सबसे बड़ा उदाहरण सचिवालय ही है. यहां एक अदना सा काम भी बिना घूस के नहीं होता. वो भी खुल्लम-खुल्ला. मनचाहा ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिये कलर्क से लेकर बाबू तक की जेबें गर्म करनी पड़ती है. यह नंगा सत्य किसी से छिपा नहीं है. जो जिस विभाग में है वहीं बस गया है. पोस्टिंग के दस पंद्रह साल बीत जाने के बाद भी इनके विभागों की बदली नहीं हुई है. निगरानी विभाग भी यहां जाने की जहमत नहीं उठाती. मुख्यमंत्री यहीं से झाड़ू लगाना शुरु करें तो ज्यादा बेहतर होगा. पिछले साल निगराणी विभाग के द्वारा अमूमन बीस पच्चीस लोगों को रंगे हाथों पकड़ा गया. आरोप पत्र दाखिल नहीं हो पाने की वजह से आज सभी के सभी जमानत पर छूट अपने पद पर दूबारा काबिज हो गये हैं. नजीर के तौर पर जन वितरण प्रणाली को ही लें. यह पूरी की पूरी व्यवस्था ही आकंठ भ्राष्टाचार में डूबी हुई है. डीलर की निगरानी के लिये एमओ को लगाया गया, उसे भ्रष्ट होते देख एसडीओ फिर डीएसओ. हालत ये हुई कि अंकुश लगने के वजाय सबका कमीशन बंधता चला गया. पिछले साल कैग ने जोधपुर के जिलाधीश कार्यालय का अंकेक्षण करने के बाद कहा था कि गरीबों को न्युनतम वेतन देने के मकसद से शुरु हुई मनरेगा योजना मजदूरों के घर का दिया तो नहीं जला सकी लेकिन इन अधिकारियों के घरों का रंग-रोगन अवश्य हो गया. आज यहां भी मनरेगा में यही लूट मची हुई है. आये दिन इससे जुड़ी शिकायतें देखने सुनने को मिल जाती है. हालत यह है कि इंदिरा आवास से लेकर जाति प्रमाण पत्र बनवाने तक के लिये एक खास रकम मौखिक रूप से तय है. और हम भी सहर्ष लेन-देन करते हैं. हमारा सामाजिक खांचा ही एसा है कि हर अदमी जल्द से जल्द अमीर होना चाहता है. हमारी यही आपा-धापी हर गड़बड़ी की वजह है. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को गांव-गांव तक ले जाना जरूरी है. जरूरत है कि हम अपने दायित्वों के प्रति जिम्मेवार बनें. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दिशा में सार्थक कदम हर नागरिक को उठाना होगा. वक्त आ गया है कि हम समाज की दशा और दिशा खुद तय करें.

Wednesday, January 12, 2011

उम्मीद है उम्मीदों पर नहीं फिरेगा पानी


सूबे के सरदार इनदिनों कई तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं. मातृशोक से अभी उबर भी नहीं पाये थे कि विधायक हत्याकांड ने एक नया बखेरा खड़ा कर दिया.

सूबेदार की चुप्पी पर भी लोगों ने सवाल खड़े करने शुरु कर दिये थे. एक तो करेला उपर से नीम चढा वाली कहावत को एन वक्त पर हमारे मोदी साहब ने और चरितार्थ कर दिया. तथ्यों की पड़ताल किये बिना ही उन्होंने रूपम पाठक को ब्लैकमेलर तक कह दिया. आखिरकार नीतीश ने हत्या कांड की C.B.I जांच हो इसकी सिफारिश कर ही दी. एक महिला का हथियार उठा लेना और थोड़ा पीछे देखें तो नीतीश ने अपने एक चुनावी सभा के दौरान विधायक केसरी को मंच से जाने को कह दिया था. ये दोनो ही बातें इतना बताने को काफी हैं कि दाल में काले का अंश है. एसे में रुचिका गिरिहोत्रा का मामला याद आता है. दोषी साबित होने के बाद एस. पी. एस. राठौर से सम्मान और पदक छीन लिये गये थे. कहीं हमारे उप-मुख्यमंत्री को को ये न कहना पड़े कि हमे सच्चाई क पता न था. हम शर्मिंदा हैं. आये दिन रूपम पाठक के पक्ष में स्वर मुखर हो रहे हैं. इसी घटनाक्रम में एक स्थानीय पत्रकार का गिरफ्तार होना और बिहार की पूरी मीडिया का चुप्पी साध लेना एक विडंबना ही कही जायेगी.

ताजपोशी के तुरंत बाद सरदार ने भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने की बात कही थी. कई महकमों एवं अधिकारियों को हड़काया और चेताया भे. इस क्रम में मुख्यमंत्री सचिवालय को भूल जायेंगे एसी उम्मीद नहीं है. जहां एक मामूली सी सिफारिश के लिये भी रिश्वत की दरकार पड़ती है.

एक और समस्या जो सुरसा की तरह मुंह बाये इनकी तरफ दौड़ी आ रही है. मुजफ्फरपुर के मरबन में बन रही एसवेस्टस फैक्ट्री कहीं इन्हें मुश्किल में न डाल दे. अभी हाल ही में मजदूरों के धड़ने को जिस तरह से बंदूक के बल पर कम्पनी के मुलाजिमों ने खदेड़ा, और शासन-प्रशासन के रवैये से लगता है दूसरे नंदीग्राम की जमीन तैयार की जा रही है. भूमि अधिग्रहन से लेकर अब तक वहां की खेतीहर जनता को बालमुकुंद एंड कम्पनी ने ठगने का ही काम किया है. लगभग ५६ देशों में बैन होने के बाद यह बताना जरूरी नहीं है कि एसवेस्टस फैक्ट्री किस हद तक घातक होती है. एक तो घनी आवादी वाला क्षेत्र उसमें भी कृषि योग्य भूमि पर फैक्ट्री लगाने की इजाजत दे देना नादानी ही दिखती है. विकास के इस अंधी दौड़ में कहीं जमीन के लोग कुचल न दिये जायें. उम्मीद है हमारे विकास पुरुष इस बात का ख्याल रखेंगे और सभी मुश्किलों से पार पा जायेंगे.

Thursday, October 14, 2010

हंगामा है क्युं बरपा……..!

हैरान करने वाली बात है कि अंधभक्त और जुझारू कार्यकर्ता आज अपनी-अपनी पार्टियों से नाराज हैं. पिछले कई दिनों से राज्य की हर बड़ी पार्टी कार्यालयों के भीतर या बाहर रिआया अपने राजा के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है. कहीं नंग-धड़ंग प्रदर्शन, कहीं नारेबाजी तो कहीं तोड़-फोड़ और धक्का-मुक्की भी. विरोध दर्ज कर रहे ये कार्यकर्ता और उनके समर्थक कई सालों से पार्टी के झंडाबरदार हैं और पिछले कई महीनों से उम्मीदवारी के लिये पटना में पेटकुनियां दिये हुए हैं.
बीते दिनों भाजपा कार्यालय में तोड़-फोड़ और गाली-गलौज का नजारा था. बेगुसराय विधानसभा से विधायक श्रीकृष्ण सिंह को टिकट नहीं देकर सुरेंद्र मेहता को उम्मीदवार बनाया गया. श्री सिंह उपचुनाव जीत कर विधानसभा आये थे. इस सीट पर कभी तुनक मिजाजी सांसद भोला सिंह का अधिकार हुआ करता था. खबर यह भी है कि पार्टी इस बार उनकी बहु को टिकट दे चुकी है. वैसे पिछली बार उपचुनाव में अपनी सीट से बेटे को प्रत्याशी बनाना चाहते थे.
अब एसे पुत्रमोह और परिवार मोह देख रिआया नाराज होती है तो राजा की क्या गलती !
बेगूसराय के ही बछवाड़ा विधानसभा से कुंदन सिंह को प्रत्याशी बनाये जाने से भी कार्यकर्ताओं मे आक्रोश है. जनता के पास कुंदन सिंह के एक-एक दिन का हिसाब है कि उन्होंने भाजपा के लिये क्या, कितना और क्युं किया है. ग्यात हो कि ये उसी उपेंद्र सिंह के पुत्र हैं जो पिछली बार लोजपा के प्रत्याशी रह चुके हैं और इस बार भी उनके चुनाव लड़ने की संभावना प्रबल है.
इतना ही नहीं कुचायकोट के कार्यकर्ताओं ने भी भाजपा कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन किया. इनलोगो का कहना था कि पहले ये कटेया विधानसभा थी परिसीमन के बाद यह कुचायकोट हो गयी है. इस सीट से भाजपा के मिथलेश सिंह चुनाव लड़ते थे. अब जदयू इस पर अपनी दावा ठोंक रही है.
उधर जदयु कार्यालय की स्थिती भी बेहतर नहीं हैं. पार्टी कार्यालय के गेट पर लटक रहा ताला कार्यकर्ताओं का मुंह चिढा रहा है. असंतोष के कारण कार्यकर्ताओं का विरोध प्रदर्शन यहां भी देखने को मिल रहा है.
विधान सभा अध्यक्ष उदय नारायन चौधरी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए जदयू कार्यकर्ताओं ने नंगे बदन प्रदर्शन किया. उनका आरोप था कि श्री चौधरी के प्रभाव में आकर शेरपुर से विनोद यादव को प्रत्याशी बनाया गया है. नाराज कार्यकर्ताओं का कहना था कि शेरपुर से किसी स्थानीय कार्यकर्ता को ही टिकट दिया जाय. जदयू के ही महादलित प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार सदा भी नाराज दिखे. और यह कहते हुए अपने पद से इस्तिफा दिया कि टिकट बंटवारे में महादलितों की उपेक्षा हुई है. उन्होंने कहा कि अलौली से उन्हें टिकट देने की बात थी लेकिन क्या कारण रहा कि अचानक रामचन्द्र सदा को प्रत्याशी घोषित कर दिया गया.
मकदमपुर से मंत्री जीतन राम मांझी को प्रत्याशी बनाये जाने के कारण विरेंद्र पासवान के समर्थकों ने भी जम कर हो-हल्ला किया.
सुशासन कुमार के सुशासित कार्यकर्ता आज उनपर ही टिकट बंटवारे को लेकर फर्जीवाड़े का आरोप लगा रही है. फिलहाल सुशासन बाबु के पास अपने नाराज सिपाहियों के सवालों का जवाब नहीं ही है.
अब तो सुप्रिमों के खिलाफ भी विरोध के स्वर बेखौफ फूटने लगे हैं. अभी पिछले ही दिनों गुस्साये कार्यकर्ताओं ने पटना स्थित कार्यालय में जमकर हंगामा किया. पार्टी के कोई पदाधिकारी तो वहां मिल नहीं पाये, बेचारी कुर्सियों को इनके गुस्से का शिकार होना पड़ा. कार्यालय के कर्मचारी प्रदर्शन थमने के बाद भी बाहर निकलने की हिम्मत जुटा नहीं पा रहे थे.
महुआ मुकुंदपुर पंचायत की मुखिया मंजू देवी ने राजद सुप्रीमो पर पैसे लेकर सीट का सौदा करने का आरोप लगाया है.
एम.पी(मुखिया पति) कामेश्वर राय का यहां से टिकट लगभग तय था. मुखिया मंजु देवी ने कहा कि सुप्रिमों के कहने पर चुनाव की तैयारी चल रही थी अचानक उन्होंने योगेश्वर राय का नाम घोषित कर दिया.
पूर्व मुख्यमंत्री रावड़ी देवी इस बार राघोपुर और सोनपुर दोनो विधानसभा से चुनाव लड़ेंगी. राजद के विभिन्न पदों पर रह चुकीं समर्पित कार्यकर्ता नूतन पासवान से जब इस मुद्दे पर बात हुई तो उनका कहना था कि राजद में सिर्फ रावड़ी ही एक महिला हैं इसिलिये उन्हें दो-दो जगहों से लड़वाया जा रहा है. बात ही बात में उन्होंने जय प्रकाश नारायण को लालू का लोकनियां बताना नहीं भूला. पार्टी के रवैये से खासे नाराज नूतन पासवान ने कहा कि लालटेन तो बुझेगी ही लेकिन झोपड़ी को जला कर ही.
लोजपा की स्थिती भी औरों जैसी ही है. यहां भी कार्यकर्ताओं की नाराजगी साफ तौर पर दिख रही है. कई दिनो से कार्यकर्ता लोजपा दफ्तर के बाहर धरना पर बैठे हुए हैं. जिनकी उम्मीद टूट गयी वो निराश हो अपने शहर, गाँव लौट रहे हैं. धरना पर बैठा हर दूसरा आदमी इसे परिवार लिमिटेड पार्टी कहने से नहीं चूक रहा है. और एक इनके अध्यक्ष महोदय हैं जो बड़े ही कुतार्किक ढंग से परिवारवाद को खारिज करते आ रहे हैं.
निराश हो कर लौट रहे भागलपुर दुसाध महासभा के महासचिव चंद्रदेव पासवान ने झल्लाते हुए कहा कि बेच लिया है सब टिकटवा. उन्होने बताया कि तिरपैंती विधानसभा की सीट को पार्टी ने पचास लाख में एन.के.यादव को बेचा है.
सबसे बुरी हालत तो कांग्रेस की है. नाराज कांग्रेसियों ने हवाई अड्डे से बाहर निकल रहे विधायक दल के नेता डा. अशिक कुमार पर हमला बोला वहीं प्रदेश अध्यक्ष मह्बूब अली कैसर से तो कार्यकर्ताओं की हाथा-पाई भी हो गयी.
पटना के अलावा भी कई अलग-अलग जिलों मे कांग्रेसियों ने हंगामा किया है. गोपालगंज और सहरसा से थोड़-फोड़ की खबर है वहीं पुर्णियां में कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस दफ्तर को ही आग के हवाले कर दिया.
धमदाहा से डा. इरशाद खाँ के चुनाव लड़ने की बात कही जा रही है जबकि यहां के स्थानिय लोगों का कहना है कि अमरनाथ तिवारी यहां के ससक्त उम्मीदवार हैं.
नौतन, महुआ और तरैया से आये कार्यकर्ताओं ने कहा कि जब तक न्याय नहीं मिलेगा विरोध जारी रहेगा.
फिलहाल खबर है कि भाजपा और कांग्रेस भी अपने कुछ घोषित उम्मेदवारों के नामों पर पुनर्विचार करेगी.
लगातार हर दल के कार्यकर्ताओं के द्वारा कहीं ज्यादा कहीं कम रूप से प्रतिरोध जारी है. कहीं ऐसा न हो कि रहनुमाओं को अपनी जनता पर से विश्वास उठ जाये और इसे भंग कर नयी जनता चुन ली जाय.
फिलहाल जो प्रतिरोध की प्रवृति पनपी है वो कितना कारगर और टिकाउ होगी देखने की बात है.

Thursday, August 5, 2010

आओगे जब मैं तुमको गले लगा लूंगा


कर यकीं तेरा दामन मैं बचा लूंगा
तेरी करतुतों को दिल में दबा लूंगा

दोस्त हो फिर गैरों सा बर्ताव क्युं
वार तुमसे तो सीने पे भी खा लूंगा

आस थी तुमसे सगे भाई से अधिक
इस चाह को अब सीने में छुपा लूंगा

कौन दोषी है ज़रा यार पता करना
मैं तो नहीं, अंतर्मन से बतिया लूंगा

चलन भरोसे का कहीं उठ न जाये अब
आओगे जब मैं तुमको गले लगा लूंगा

देखा-सुनी