Sunday, August 16, 2009

प्रेम का सागर

जो प्रेम दिल में पनपा था
सब भाव-विह्वल मन का था

चंचल-नटखट भोली सि सूरत
बस देख मन पुलकित होता था

वो प्रेम की स्वाति किरण सि थी
मैं प्यासा चातक दीखता था

वो पुष्प की कोमल पंखुडी सी
मैं बूंद ओस सा लिपटा था

हौले से जब कुछ कहती थीं
मैं मंद-मंद मुस्काता था

वो शशि सि शीतल लगती थी
मैं चकोर सा उनको ताकता था

कुछ कहते-कहते थीं सो गयी वो
सिरहाने मैं उनके बैठा था

वात्सल्य था एक प्रेम में उनके
और मैं बालक बन जता था

मैं अकिंचन करता भी क्या
बस प्रेम का सागर रखता था

12 comments:

  1. वात्सल्य था एक प्रेम में उनके
    और मैं बालक बन जता था

    bahut hi khub .............badhaaee

    ReplyDelete
  2. प्यारका ये एक सुंदर , नाज़ुक ,अनोखा रूप ...! बड़ा अच्छा लगा पढ़के ...हमारे मनमे हमेशा एक बालक /बालिका का अस्तित्व होता है ..बड़े बननेके नकाब मे हम उसे दबा देते हैं ..जहाँ दबाया नही जाता , वहाँ सुख , शांती , और सरलता बस्ती है ..! उलझने कम होती हैं..!

    yaad aa gaya gulzaar likha wo ajramar geet,
    " hamne dekhee hai,un aankhon kee mahktee khushboo.." pyarkee koyee parbhasha nahee ho saktee...

    http://shamasnsmaran.blogspot.com

    http://kavitasbyshama.blogspot.com

    http://shama-kahanee.blogspot.com

    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

    ReplyDelete
  3. shashi haalanki main tumhari yeh kavita tumhare hi muh se sun chuki hoon par yahan padh kar aek baar phir kehna chahti hun..
    वो पुष्प की कोमल पंखुडी सी
    मैं बूंद ओस सा लिपटा था

    behad khoobsoorat aur paak

    ReplyDelete
  4. बहुत ही सुन्दर रचना.

    सागर जी , यहाँ सि की जगह सी होना चाहिये न..?.या मै गलत हूँ...?

    आपका स्वागत है.

    गुलमोहर का फूल

    ReplyDelete
  5. आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं

    ReplyDelete
  6. saari tarif to sabne kar di bt itna hi kahna chahungi Heart Touchable poetry

    ReplyDelete
  7. आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . आशा है आप अपने विचारो से हिंदी जगत को बहुत आगे ले जायंगे
    लिखते रहिये
    चिटठा जगत मे आप का स्वागत है
    गार्गी

    ReplyDelete
  8. BHAUT SUNDER ATI SUNDER ALL THE BEST
    SI JI

    ReplyDelete
  9. वो शशि सि शीतल लगती थी
    मैं चकोर सा उनको ताकता था...

    wah behad khoobsurat..

    ReplyDelete
  10. shashi da bahut khoob apne shakespeare ki kavita all the world is astage ki yaad dila di vatsalya wali pankti mujhe bahut acchi lagi waise apki rachna bahut hi sadhi hai

    ReplyDelete
  11. ठगा सा लग रहा हूँ आज ऐसे
    कुछ बच्चे हों जैसे फुसलाये हुए

    kabiletarif...........upma.......shubhkanaye

    ReplyDelete
  12. hii shashi ji yahi wo kavita thi jo mujhe bahut achi lagi thi...really soooo.....mind blowing......bahtu hi jyada achchi hai

    ReplyDelete

देखा-सुनी